अंकुर

 जब अंतर्द्वंद से मन लड़ रहा हो

अंदर पड़ा आकाश मर रहा हो

तब उठना फिर जोर लगाना

सबके लिए एक धरती बनाना।


जब बादल सबकुछ स्याह कर रहा हो 

अंतिम कतरा रौशनी का काला पड़ रहा हो 

एक बाँस उठाना, बादल मे जोड़ से घुसाना

अमृत बरसा कर प्रकृति फिर से सजाना

सबके लिए एक धरती बनाना।


जब तुम टूट रहे हो और सब कुछ बिखर रहा हो

कलुषित शरीर संग आत्मा सड़ रहा हो

एक कलम लेना, उंगलियों मे फसाना

घावों को उकेर कोरे काग़ज़ पर, दोबारा कोशिश की राह ले आना

सबके लिए एक धरती बनाना।


                                                - मिक्की चौधरी 

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट