अनछुए सतह पर
हाँ सिमटा, सिकुड़ा, संक्षिप्त सा खड़ा हूं सतह पर
हाँ बिखरा, टूटा, विदीर्ण सा गिरा पड़ा हूं सतह पर
लथपथ, घायल, लहूलुहान, बिंधा हुआ सो रहा हूं सतह पर
हाँ एकाकी, खुद से भी दूर वहीं हूं सतह पर.
उसी सतह पर, उसी अनछुए सतह पर,
जो तुमसे उतनी ही दूर है जितनी यह धरती आकाश से.
हाँ वही अनछुआ सतह जो नजदीक है तुम्हारे उतना ही
जितना कि मैं तुम्हारे ख़यालों से और दूर बस इतना सा जितनी तुम मेरे हर पहलू से.
जोड़ रहा हूँ उन टुकड़ों को जो मुझसे टूट चुके हैं और टूट कर गिरे थे इसी सतह पर
उन आंसुओं को समेट रहा हूँ जिन्होंने भिगोया था इस सतह को
हर लम्हा वापस बंद कर रहा यादों की संदूक मे जो इस सतह पर ही बिखर चुके हैं कहीं
हाँ यही सतह जो अनछुआ है, लेकिन फिर भी इसे मैंने स्पर्श किया है अपनी रूह से.
घाव भर रहे हैं आत्मा के लेकिन भरेंगे नहीं क्योंकि इसे जिंदा रखेगा यह सतह बिना छुए
बन रहा हूँ फिर से इस समाज़ के लायक जिसने नापाक घोषित कर छोड़ दिया था मुझे इस सतह पर
सार यही है, इंसान बनूँ या नहीं तेरे लायक रहूं या नहीं
कहीं मिलूँ नहीं तो एक बार फ़ेर लेना नजर इसी अनछुए सतह पर
ये सतह तुम्हें दिखे या ना दिखे लेकिन मैं मिलूंगा यही हमेशा.....
इसी अनछुए सतह पर हमेशा.
- Micky choudhary
वाह कमाल लेखनी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ❤️😍🙏
हटाएंअत्तिसुन्दर पंक्ति भाई 👏👏
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद ❤️😍🙏
हटाएंसुंदर लेखनी👌
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ❤️😍🙏
हटाएंमैं रहूँ या ना रहूँ । आ जाना इसी अनछुए सतह पर......👌
जवाब देंहटाएंरूह मेरी होगी वहीँ कुछ सोचती उसी सतह के बारे मे
हटाएंजबरदस्त सर जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर जी ❤️😍🙏
हटाएंअनछुए सतह....हृदय के हर कोने को छूने में सफल.... अगली कड़ी का बेशर्बी से इंतज़ार..
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ❤️😍🙏.
हटाएंअगली किश्त जल्द आने की कोशिश रहेगी ❤️🙏
अनछुए सतह पर तू मिले ना मिले,
जवाब देंहटाएंअनसुने सिसकियों की राग तु सुने ना सुने ,
मगर इन शब्दों में छुपे ख्वाब तेरी रूह तक उतर आएगी,
फिर तेरे दिल के भी किसी सतह से उठेगी
अनछुए सतह पर सिमटा, सिकुड़ा.....
बहुत ही हृदय मोहक कविता
बेर बेर परहै के मोन करै यै।
बहुत खूब।
जवाब देंहटाएंAdhvut 😍😊
जवाब देंहटाएंडरता है दिल ये
जवाब देंहटाएंकि कहीं मैली ना हो जाए
सतह ये
तेरे छूने से पहले
अमानत को तेरी
बचाने की ज़िद में
मैं अपनी नज़रें बिछाता हूं
इस अनछुए सतह पर...
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बहुत सुंदर भाई जी