काली जमीन

 इस सन्नाटे की आकुलता चीरती है सोच को

मिटाती है छुपाती है हर ज़ख्म, हर नोच को


उतारती है साड़ी जो थी द्रोपदी के तन पर

नाचती है जोरों से उस मौन के कफन पर

काला कफन काला ही मन काला चमन पर

चमचमाते चौथे स्तंभ का था काला सुख़न पर


वक्ष घायल, भाल घायल, धरती का श्रृंगार घायल 

कड़कड़ाती बेड़ियों मे स्वच्छंदता का सरोकार घायल


धधक रही चिता जो है वो शायद भीड़तंत्र का है

सहमा, सकुचा जलता हुआ भी मानो किसी यंत्र सा है

वो देखो आ गई है सत्ता उसी चिता पर पेड़ लगाने

चिता की चुप्पी के बल पर हर ज़ख्म, हर नोंच छुपाने


बोलो तुम भी नहीं तो एक रोज़ अंधेरा खुद चीखेगा

उस चीख की तेज काली रौशनी समेट लेगी सब कुछ और स्याह बचेगा.

                                                  - मिक्की चौधरी 

टिप्पणियाँ

  1. सुंदर लेखनी! आज के स्थिति से अवगत कराती हुई।

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  2. वो देखो आ गई है सत्ता उसी चिता पर पेड़ लगाने
    चिता की चुप्पी के बल पर हर ज़ख्म, हर नोंच छुपाने

    बोलो तुम भी नहीं तो एक रोज़ अंधेरा खुद चीखेगा
    उस चीख की तेज काली रौशनी समेट लेगी सब कुछ और स्याह बचेगा

    बिल्कुल सही... भारतीय राजनीति का निम्नतम स्तर

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