भटका सा
ये हवा बिखर रही है समेट सकते हो तो समेटो।
जहरीली हो गई है सहते सहते,
हर सितम हर जुल्म ने इसे जहरीला बनाया है,
ये जुल्म कहीं तुम्हारे ही तो नहीं।
कहीं तुमने ही तो नहीं काटा उस दरख्त को,
जो करती थी उसके ज़ख्मों को निष्क्रिय।
वो झूठी कसमें, वादे कब तक रखती जिंदा उसे,
कहीं ये वफ़ा की झूठी फरमाइशें भी तुम्हारी ही तो नहीं।
ये तो तय है कि वो हवा तो मैं हूँ
शायद तुम समेट सकते हो इसे बिखरने से।
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