लिखूँगा
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।
कहीं दूर लगी नफ़रत की आग पर प्रेम का सैलाब लिखूँगा।।
लिखूँगा धर्म के चमड़े पर भी जो नोंची जा रही है,
हवस के भूखों के आगे परोसी जा रही है।
नीचे वालों को दबाना पैरों तले शबाब लिखूँगा।
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।।
लिखूँगा झंडे मे लिपटे किसी कोख, किसी सिंदूर पर भी,
कफन मे भी घोटाला कर चिल्लाने वाले राजनीतिक गुरूर पर भी।
जब ये लिखूँगा तो बेतरतीब बेहिसाब लिखूँगा।
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।।
लिखूँगा चौराहे पर पीटते गाँधी को मीडिया की जेब मे,
फुटपाथ पर सोते हुए आँधी को सर्द रातों की ऐब मे।
लिखने को मिला प्रश्न कभी तो उलट कर जवाब लिखूँगा।
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।।
लिखूँगा भागते भीगते स्वतंत्रत को झूठे वायदों की बरसात से,
घायल गणतंत्र को संसद की कुर्सी के आघात से।
झूठ मूठ का शासक को सेवक, जनता को नवाब लिखूँगा।
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।।
- मिक्की चौधरी
❣️
जवाब देंहटाएंलिखूँगा झंडे मे लिपटे किसी कोख, किसी सिंदूर पर भी,
जवाब देंहटाएंकफन मे भी घोटाला कर चिल्लाने वाले राजनीतिक गुरूर पर भी।
जब ये लिखूँगा तो बेतरतीब बेहिसाब लिखूँगा।
पेट भरने पर इश्क़, अकाल मे इन्कलाब लिखूँगा।।
❤ ❣❣
Bahut badhiya sir ji
जवाब देंहटाएंBahut khub
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना ❣️
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