पुनर्जन्म वाली रात
रात की खामोशी अक्सर मांगती है कुछ और कुछ ज्यादा
सुनसान पड़ा मन भागने लगता है - कहीं और कुछ ज्यादा
अंधेरा जाता है अक्सर नीम के पेड़ से छत टाप, छज्जे की सूराख़ से उसे देखने
वो इन्तेज़ार मे है, मौन मे, व्याकुल आज फिर से - थोड़ा और कुछ ज्यादा.
ये रात की चीखें पलटवाती हैं कोरा पन्ना, और आँसू की स्याही उड़ेल देती है भरपूर,
सन्नाटा हंसता है जोरों से डरावना अपनी जीत पर - कुछ और कुछ ज्यादा.
उम्मीद को उम्मीद रहती है बहुत कि पूरी होगी ईच्छायें सारी रात के बाद,
ज़रा देखो तो सूरज निकला है लाल और बड़ा सा - इस ओर कुछ ज्यादा.
- मिक्की चौधरी
Superb sir
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