अंतिम रौशनी
मीलों दूर से मैं उसे महसूस कर रहा था
मेरा हर हिस्सा लाल, जल रहा था
तपिश को झेलना मुमकिन नहीं था
वो नर्क की आग थी।
याद आयी मुझे वो झाड़ियां जिन्हें मैं कुचल कर निकल पड़ता था आगे जो कमज़ोर थे मुझसे और
याद आया वो चट्टान जिसकी कड़वाहट मैंने अपनी जुबान से चाट जगबड़ाई करी थी
कमज़ोर और ताकतवर का फर्क़ मुझे आज नज़र आया क्योंकि
मेरे सामने नर्क की आग थी।
मैंने दियों से फूंके थे कभी घर,
भूल कर कि यही चिंगारी मेरे नर्क की आग मे भी प्राण भरेगी
जिस अंधे विश्वास को घात करते कभी
फिर अट्टहास करते कभी देखा था
उसे लपटों मे चित्कारते देख रहा था
वो किसी को नहीं बख्श रही थी
जो मेरे सामने नर्क की आग थी।
रंजिशें तमाम मिट रहीं थीं जेहन से
पाप ख़ाक हो रहे थे तेज आँच मे
जीवन और तिकड़म धूल मात्र थे इसके सामने
हर नापाक को पवित्र करने मुँह बाए
मेरे सामने नर्क की आग थी।
- मिक्की चौधरी
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